मनाचे श्लोक १० वा ( सदा सर्वदा प्रीति रामिं धराविं )
सदा सर्वदा प्रीति रामिं धराविं | सुःखाची स्वये सांडी जीविं करावी | देहे दुःख तें सूख मानित जावें |…
सदा सर्वदा प्रीति रामिं धराविं | सुःखाची स्वये सांडी जीविं करावी | देहे दुःख तें सूख मानित जावें |…
नको रे मना द्रव्य तें पुढिलां चें | अति स्वार्थबुध्दी न रे पाप सांचे | घडे भोगणे पाप तें कर्म खोटें…
देहे त्यागितां किर्ती मागें उरावी | मना सज्जना हेचि क्रिया धरावी | मना चंदनाचे परी त्वां झिजाव…
मना श्रेष्ठ धारिष्ठ जीवी धरावें | मना बोलणें नीच सोशीत जावे | स्वये सर्वदा नम्र वाचे वदावे | मना सर…
नको रे मना क्रोध हा खेदकारी | नको रे मना काम नाना विकारी | नको रे मना लोभ हा अंगिकारु | नको रे मना …
मना पापसंकल्प सोडुनि द्यावा | मना सत्य संकल्प जीवी धरावा | मना कल्पना ते नको विषयांची | विकारे घडो…
मना वासणा दुष्ट कामा नये रे | मना सर्वथा पाप बुध्दि नको रे | मना सर्वदा निति सोडूं नको हो | मना अं…
प्रभाते मनी राम चिंतित जावा | पुढे वैखरी राम आधी वदावा | सदाचार हा थोर सांडूं नयें तो | जनी तोचि त…
मना सज्जना भक्तिपंथेचि जावे | तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे | जनी निंद्य ते सर्व सोडुनि द्यावे | जनी…
गणाधीश जो ईश सर्वां गुणांचा। मुळारंभ आरंभ तो निर्गुणाचा॥ नमूं शारदा मूळ चत्वार वाचा। गमूं पंथ आनंत …