समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे | मनोबोध श्लोक ३०वा | manache shlok
समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे | असा सर्व भूमंडळी कोण आहे | जयाची लिला वर्णिति लोक तिन्ही | नुपेक्षी कद…
समर्थाचिया सेवका वक्र पाहे | असा सर्व भूमंडळी कोण आहे | जयाची लिला वर्णिति लोक तिन्ही | नुपेक्षी कद…
भवाच्या भये काय भीतोस लंडी | धरी रे मना धीर धाकासि सांडी | रघुनायकासारिख स्वामी शिरी | नुपेक्षी कदा…
दीनानाथ हा राम कोदंड धारी | पुढे देखता काळपोटी थरारी | जना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी | नुपेक्षी कदा…
देहे रक्षणा कारणे यत्न केला | परी शेवटी काळ घेउनि गेला | करी रे मना भक्ति या राघवाची | पुढे अंतरी स…
मना वीट मांनू नको बोलण्याचा | पुढे मागुता राम जोडेल कैंचा | सुखाची घडी लोटतां सुख आहे | पुढें सर्व …
रघुनायकावीण वांया शिणावे। जनासारिखे व्यर्थ कां वोसणावें॥ सदा सर्वदा नाम वाचे वसो दे। अहंता मनी पापि…
न बोले मना राघवेविण काही | जनी वाउगे बोलतां सुख नाही | घडिने घडी काळ आयुष्य नेतो | देहांती तुला को…
मना सज्जना हित माझे करावे | रघूनायका दृढ़ चित्ती धरावे | महाराज जो स्वामी वायूसुताचा | जना उध्दरी ना…
मना वासणा चुकवि येरझारा | मना कामना सांडि रे द्रव्यदारा | मना यातना थोर हे गर्भवासी | मना सज्जना भे…