शंकर जी कहे सुनो पार्वती | (हिंदी भजन)

॥ शंकर जी कहे सुनो पार्वती ॥

शंकर जी कहे सुनो पार्वती
दुनिया में किसी का कोई नहीं
सब जीते जी के नाते हैं
पर अंत समय पर कोई नहीं ॥ धृ ॥

थे चार रतन दशरथ जी के
उनको भी कैसा भाग्य मिला
जब राम चले वनवास उधर
और प्राण तजे तब कोई नहीं ॥ १ ॥

वनवास चली जब सीता जी
रघुवर और लक्ष्मण साथ चले
पर वक्त पड़ा ऐसा भारी
जब हरण हुआ तब कोई नहीं ॥ २ ॥

रावण जैसे महापंडित को
था वंश पे ही अभिमान बड़ा
सोने की लंका राख हुई
जब मरण हुआ तब कोई नहीं ॥ ३ ॥

॥ भजन का संपूर्ण अर्थ ॥
ध्रुवपद:
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती सुनो, इस दुनिया में वास्तव में कोई किसी का नहीं है। सारे रिश्ते-नाते केवल जीते-जी (जीवनकाल तक) के ही हैं, लेकिन मृत्यु के (अंत) समय में कोई भी साथ नहीं देता।

कडवे १:
राजा दशरथ के पास चार अनमोल रत्न (राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे महान पुत्र) थे, लेकिन उनका भाग्य कैसा था देखिए। जब श्रीराम वनवास के लिए चले गए और राजा दशरथ ने पुत्र-मोह में अपने प्राण त्यागे, तब उनके अंतिम समय में उनके पास उनका कोई भी पुत्र मौजूद नहीं था।

कडवे २:
जब माता सीता वनवास के लिए गईं, तो उनके साथ भगवान राम (रघुवर) और लक्ष्मण जी दोनों मौजूद थे। लेकिन उन पर ऐसा भारी वक्त (संकट) आया कि जब रावण ने धोखे से उनका हरण किया, तब उन्हें बचाने के लिए वहां कोई नहीं था।

कडवे ३:
रावण जैसा महान पंडित और शिवभक्त, जिसे अपने विशाल वंश और शक्ति पर बहुत बड़ा अभिमान (घमंड) था। उसकी वह सोने की लंका भी देखते ही देखते जलकर राख हो गई, और जब उसकी मृत्यु (मरण) का समय आया, तब उसके साथ या उसे बचाने वाला कोई नहीं था।

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