कमल नयन जगदिशजी । ( मधुसुदन हो ) .. ( २ )
हरीमनमोहन नाथ जय जय देवहरे ॥ धृ ॥
यदुकुल नलीन दिनेशजी । ( मुरलीधर हो ) .. ( २ )
रतिबर जनक सुरेश जय जय देवहरे ॥ १ ॥
नटवर माखन चोर हो । ( वृज के पती हो ) .. ( २ )
गोपीयन के प्रियपान जय जय देवहरे ॥ २ ॥
हलधर के तुम भ्रात हो । ( करुणानिधी हो ) .. ( २ )
कंसके कंदन नाथ जय जय देव हरे ॥ ३ ॥
देवकी के प्रिय पुत्र हो । ( भयभंजन हो ) .. ( २ )
रुक्मीन के भरतार जय जय देव हरे ॥ ४ ॥
भारत के तुम मित्र हो । ( उपदेश कहो ) .. ( २ )
हरण सकल महीभार जय जय देव हरे ॥ ५ ॥
मरुमर्दन वृजराजजी । ( तुम मालीक हो ) .. ( २ )
अनुचर राम प्रसन्न जय जय देवहरे ॥ ६ ॥
॥ आरती का संपूर्ण अर्थ ॥
ध्रुवपद:हे कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले जगदीश (संसार के स्वामी)! आप ही मधु नामक दैत्य का संहार करने वाले 'मधुसूदन' हैं। हे मन को मोहने वाले हरिनाथ, आपकी जय हो! हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे १:
हे यदुकुल रूपी कमल (नलिन) को खिलाने वाले सूर्य (दिनेश)! आप मधुर मुरली धारण करने वाले हैं। आप रति के पति (कामदेव) के पिता और देवताओं के ईश्वर (सुरेश) हैं। हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे २:
हे नटवर (श्रेष्ठ नर्तक), आप माखन चुराने वाले और सम्पूर्ण ब्रज के स्वामी (ब्रजपति) हैं। आप सभी गोपियों के प्राणों से भी प्यारे हैं। हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे ३:
आप हलधर (श्री बलराम जी) के छोटे भाई और करुणा के सागर (करुणानिधि) हैं। आप ही दुष्ट कंस का वध (कंदन) करने वाले नाथ हैं। हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे ४:
आप माता देवकी के अत्यंत प्रिय पुत्र हैं और भक्तों के सभी भयों का नाश करने वाले (भयभंजन) हैं। आप माता रुक्मिणी के स्वामी (भरतार/पति) हैं। हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे ५:
आप भारत (भरत वंश के अर्जुन) के सच्चे सखा (मित्र) हैं और कुरुक्षेत्र में उन्हें गीता का महान उपदेश देने वाले हैं। आप इस सम्पूर्ण पृथ्वी (मही) का भार (पाप और दुष्टों का भार) हरने वाले हैं। हे देव हरे, आपकी जय हो!
कडवे ६:
मुर/मरु नामक दैत्य का मर्दन करने वाले हे ब्रजराज! आप ही हमारे सच्चे मालिक (स्वामी) हैं। अपने दास/सेवक (अनुचर) 'राम' (रचनाकार) पर आप सदैव प्रसन्न रहें। हे देव हरे, आपकी जय हो!
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